Friday, December 4, 2009

मेरा ईश्वर

मन तू ढूढ़े ईश्वर को सारे जँहा में,
वो तो बसा हर एक-एक जगह में।
फूलो की महकती पंखुडियों में,
पौधों की नव -पल्लवित कोंपलो में,
खेतों की लहलहाती फसलों में,
वो तो बसा हर एक-एक जगह में।
बच्चों की निश्छल मुस्कान में,
किसी की पाक मोहब्बत में,
पराये दर्द से पीड़ित दिलों में,
वो तो बसा हर एक-एक जगह में।
ओंस की चमचमाती बूंदों में,
बारिश की पहली फुहार में,
मोसम के बदलते रूप में,
वो तो बसा हर एक-एक जगह में।

Monday, November 2, 2009

मेरे साथ रहता है

तुम ना सही तुम्हारा ख्याल मेरे साथ रहता है,
वो याद बनकर मेरे जीवन को महकाया करता है।
साथ नही तू मेरे, दूर होकर भी तुझसे खुश हू,
तेरा अहसास तो हर -पल मेरे साथ रहता है।
तेरा संग ना सही तुझे पा लेने का जूनून तो मिला
मिलने को तुझसे मेरा मन बेकरार रहता है।
यह सच है की बिन तेरे बेरंग जीवन मिला,
मन तो सदा हर एक लम्हा तेरे साथ रहता है।

Friday, September 11, 2009

एक बार लौट आओ !

सीखे थे चलना जीवन में जिन हाथो को पकडे,
अब उन हाथों को देने सहारा,एक बार लौट आओ।
बिन कुछ कहे मासूम ढूढ़ते तुमको जंहा में,
करने उनकी साकार तमन्ना,एक बार लौट आओ।
अधूरे रखे है काम जो तुम छोड़ गए थे,
करने को पुरा उन्हें,एक बार लौट आओ
संजाये थे जो सपने संग तुमने और मैंने
सपनों को अपने संजोने, एक बार लौट आओ।
तुमने जो किए थे मुझसे हजारों वादे ,
वादों को निभाने,एक बार लौट आओ।
इंतजार में तुम्हारे द्वार पर लगी मेरी निगाहे,
करने को खत्म मेरी प्रतीक्षा,एक बार लौट आओ।
जीवन लगता नीरस बेरंग जिंदगी बिन तेरे,
ले लो मेरी उमर रंग भरने,एक बार लौट आओ।



Thursday, July 9, 2009

छाता कंप्यूटर इंजिनियर का

बारिश हो रही थी जोरों से,
घर जाने की भी जल्दी,पर जाए कैसे
छाता अपना लेकर आना जो हम भूल गए।
उलझन में थे हम तभी आवाज आई
अरे! आप गई नहीं काफी देर हो गई।
देख सहकर्मी को अपने कहा- छाता नहीं लाये।
भीग जायेगे बारिश में इस डर से
कर रहे है इंतजार इसके रुकने का
थम जाय जो यह बरसात तो हम घर जाए।
हम लेकर आये है छाता अपना
लाकर देते है हम उसे ले जाए आप
मुस्कराते हुए महाशय अपना छाता ले आये।
समस्या का हमारी समाधान मिल गया
धन्यवाद दे उनको हमने छाता लिया
खोलकर छाता, खुश होते हुए घर को चल दिए।
पंहुच कर घर उसे बंद करना चाहा
किए बहुत जतन,पर नाकाम हुई कोशिश
छाता ऐसा की जैसे ठान लिया बंद होना ना चाहे।
ऑफिस से घर तक ली हमने सबसे मदद
सबने कहा-माफ करना नहीं कर पाए बंद
खुला छाता लेकर हम उन्ही महाशय के पास आये।
आपके छाते से हमको मिली बहुत मदद
पर सच कहे बन गया यह हमारे लिए सर-दर्द
लौटा रहे सधन्यवाद, माफ़ करना बंद नहीं कर पाए।
सादगी से महाशय बोले- करने का तरीका थाअलग
करने से उस तरह हो जाता आसानी से बंद
गल्ती हुई हमसे बड़ी आपको बताना भूल गए।
हम मुस्कराए गल्ती आपसे नहीं हुई हमसे
जो कंप्यूटर इंजिनियर का है यह छाता
जानकर भी आपसे पासवर्ड लेना भूल गए।


Friday, July 3, 2009

तन्हाई

जुदाई से तेरी हम टूट कर रह गए।

हम बड़े ही असहाय होकर जी रहे।

अंजान थे हम तन्हाई से पहले मगर।

आज तन्हाई से इस कदर रूबरू हो लिए।

तन्हाई हमारी मेहमान बनकर रह गई।

सहने की तन्हाई हमारी आदत बन गई।

तन्हाई के साये में हम अपने से भी दूर हो गए।

Wednesday, July 1, 2009

जीत का उपहार

बुलंद इरादे कर हर कदम बढ़ाना,
मंजिल हरदम पास है।
राह में मुश्किलों से न घबराना,
हिम्मत का अहसास है।
नामुमकिन कोई काम नही अगर,
कर जाने की चाह है।
परिश्रम से सपनों का भवन बनाना,
भाग्य भी देता साथ है।
मेहनत, लगन ,दृढ़-निश्चय जिसके साथी,
मिलता जीत का उपहार है।


Wednesday, June 3, 2009

औरत

हँसना सीखा जिंदगी के मजाक पर,
सबकी खुशियाँ चाहती है वो।
जब अपना कोई दिल तोड़ कर जाता,
दो आँसू बहाकर रह जाती वो।
इम्तिहान ये जिंदगी के इतने लम्बे,
दे देकर उनको ना थकती वो,
छिन जाता अगर उसका सब कुछ,
चुपचाप देखा करती वो।
इंतजार के लम्हों की आदत बरसों से,
मिलन के सपने बुनती वो।
जीवन की राह सरल हो या हो मुश्किल,
हर-पल बढ़ती ना रुकती वो।

Friday, May 29, 2009

दोस्ती

समन्दर की गहराईयों से गहरी,
सीप के मोती सी सच्ची है यह दोस्ती।
आसमाँ की ऊचाईयों से कई ऊची,
प्रेम- विश्वास का दूसरा नाम है दोस्ती।
संसार का सबसे हँसी जज्बात ,
शायर की गज़ल कवि की कविता है दोस्ती।
झील में खिलता हुआ कमल,
चमन को महकाती सी खुशबू है दोस्ती,
मोहब्बत से भी प्यारी,
सच्चे ईश्वर का प्रतिरूप है पाक-दोस्ती।
नफरत को स्वयं में समा लेती,
नफरत से भी नफरत ना करे प्यारी सी दोस्ती।
भगवान का मिला वरदान,
जिंदगी बनती जन्नत जो मिल जाय सच्ची-दोस्ती।

Thursday, May 14, 2009

साथ

सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ।
सूरज आता नित अपनी स्वर्णिम किरणों के साथ।
चाँद खिलता सदा शीतल चाँदनी की आभा के साथ।
आसमान को भी मिलता झिलमिल सितारों का साथ।
सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ।
फूल महकते हर पल रंग-बिरंगी तितलियों के साथ।
काली-घटाए बरसती जगमगाती बिजलियों के साथ।
प्रकृति भी करती नव-श्रृंगार पाकर मौसम का साथ।
सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ
सवेरा होता मन्दिर की सुमधुर घंटियों की ध्वनी के साथ।
साँझ ढलती लौटती गायों के घुंघरु की आवाज के साथ।
हर पल को भी मिलता नव-सपनों की संरचना का साथ।
सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ।

Wednesday, April 8, 2009

दरमियाँ

तेरे मेरे दरमियाँ जन्म-मरण के फासले है।
जिधर देखती हू मुश्किलें ही मुश्किलें है।
अपने संग होकर भी अब बेगाने लगते है।
जिंदगी के सब रास्ते बिन तेरे मायूस है।
मर सी गई जैसे जीवन की हर तमन्ना है।
दुनिया की इस भीड़ में भी हम तन्हां है।
हाल क्या होंगा तेरा फिक्र मुझे सताती है।
खोकर तेरे खयालों में तन्हा राते कट जाती है।

Wednesday, April 1, 2009

संस्कार

संस्कार शब्द का सीधा और सरल अर्थ होता है शुद्धिकरण, अर्थात मन, वाणी और शरीर का सुधार होना। हमारे सभी अच्छे या बुरे कर्मो के प्रेरक हमारे संस्कार होते है।

हमारे बच्चों में भी वही संस्कार हो जो हमें हमारे बडों से मिले है, प्रत्येक माता-पिता की प्रबल इच्छा होती है। और साथ ही साथ बच्चों को संस्कारवान बनाने की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी माता-पिता की ही होती है।

पहले हम सभी सयुक्त परिवार में रहा करते थे। उस समय माता-पिता के द्वारा अपने बच्चों को संस्कार देने में कमी होने पर, उस कमी को हमारे बुजुर्ग पूरा कर दिया करते थे। और वह अपनी छोटी-छोटी पर सारगर्भित बातों से बच्चों को संस्कार का पाठ पढाया करते थे। दादी- नानी की कहानियों से बच्चों को बहुत कुछ सीखने को मिलता था।

भारतीय त्योहारों के बारे में सोचे तो यह त्यौहार भी बच्चों को संस्कार का पाठ पढ़ाने में सहायक होते थे। तथा साथ ही साथ उन्हें रिश्तों के लिए जिम्मेदार भी बनाते थे। आज कम से कम हमें अपने बच्चो को अपने सभी त्योहारों से अवगत कराना चाहिए। जिससे वह हमारे संस्कार और संस्कृति को जान सके।

विद्यालय शिक्षा का वह मन्दिर होता है , जहा बच्चा नैतिकता और शिष्टता का पाठ पढता है लेकिन उसका प्रथम विद्यालय उसका घर और सबसे पहली गुरु उसकी माँ होती है। माँ जो शिक्षा और संस्कार अपने बच्चों को दे सकती है वह शिक्षा उसे किसी भी स्थान पर प्राप्त नहीं हो सकती।

आज के युग में हमारे पास समय का अभाव है फिर भी हमें अपनी इस भाग-दौड़ की जिंदगी से थोड़ा सा समय निकाल कर कुछ प्रयास जरुर करना चाहिए। डर लगता है की आधुनिकता की इस अन्धी दौड़ में हमारे संस्कार और संस्कृति सिर्फ सुनहरी यादे बन कर न रह जाए।

Wednesday, March 18, 2009

माँ

ईश्वर जब अकेले न सबको संभाल पाया।
उसके मन में भी मदद का खयाल आया।
हर परिवार में अपना प्रतिरूप माँ को बनाया।
जन्म लेते ही ज़ुबां पर सबकी नाम माँ आया।
कई रातों तक स्वयं जाग जिसने हमें सुलाया।
अपने बच्चों की पीडा पर पीड़ित हो दिल रोया।
अपनी आँखों से जिसने दुनिया को हमें दिखाया।
क्या अच्छा क्या बुरा इसका माँ ने ज्ञान कराया।
प्रतिपल मार्ग-दर्शन कर जिसने हौसला बढ़ाया।
माँ के आँचल की छाया में संसार सिमट आया।
पाने माँ का प्यार ईश्वर धरती पर जन्म ले आया
माँ के चरणों में शीश झुका अतिशय सुख पाया

Monday, March 16, 2009

तेरा प्यार

जन्नत थी जिंदगी जब संग था तेरा प्यार।
दिल के अरमानों की मंझिल था तेरा प्यार।
जिंदगी के तूफानों का साहिल था तेरा प्यार।
बिखरे हुए लम्हों में हौसला देता तेरा प्यार।
मेरे हर जख्म पर बनता मरहम तेरा प्यार।
लबो की हँसी बन खिलखिलाता था तेरा प्यार।
गम के अंधेरो में रोशनी सा जगमगाता तेरा प्यार।
दूर होकर भी मेरे गीतों में गुनगुनाता है तेरा प्यार।
टूटकर बिखर गई जिंदगी जब जुदा हुआ तेरा प्यार।

Thursday, March 5, 2009

चाह

तेरे बिन जीना है बड़ा मुश्किल
सिर्फ यही बात कहना चाहती हूँ।

ख्वाबों में तो मिलते हो हर दिन
हकीकत में मिलना चाहती हूँ।
बहुत जाग चुकी तेरी यादों में
तेरी बांहों में सोना चाहती हूँ।

किताबों के पलटते पन्नों की तरह
अपनी किस्मत बदलना चाहती हूँ।
तेरे साथ बिताये थे जो खुशनुमा पल
उन्हें फिर से लौटा लाना चाहती हूँ।
बढ़ जाता जब जुदाई का दर्द इस कदर
जीना नहीं, मर जाना चाहती हूँ.

Wednesday, March 4, 2009

तुम आते हो..

जब तुम आते हो मैँ दीवानी हो जाती हूँ।
पाते ही तुमको ख़ुद से बेगानी हो जाती हूँ।
तेरे नैनों में खोकर प्रेम मग्न हो जाती हूँ।
तेरी बांहों में अतिशय सुख पा जाती हूँ ।
स्पर्श तेरा पाते ही कलियों सी खिल जाती हूँ।
ख्वाबों के आँगन में सपनों के दीप जलाती हूँ।
ह्रदय के झंकृत तारों से प्रेम का साज सजाती हूँ।
तेरे सजदे में अपना सर्वस्व अर्पण कर जाती हूँ।


Thursday, February 26, 2009

अपना घर

एक चिड़िया के बच्चे चार, घर से निकले पंख पसार।

पूरब से पश्चिम को आए , उत्तर से दक्षिण को धाये।

घूम-घाम जब घर को आए, अपनी माँ को वचन सुनाये।

देख लिया हमने जग सारा, सबसे अपना घर है प्यारा।

सुनकर आँख में पानी आया, माँ ने उनको गले लगाया।

सबसे सुंदर सबसे प्यारा, अपना घर है सबसे न्यारा।

Thursday, February 19, 2009

कलयुग

झूठों का बोलबाला, होती है जय-जयकार

सच्चाई दम तोड़ती है।

अनीति का चलता सिक्का, फैला है भ्रष्टाचार

राजनीति पाँव जमाती है।

आतंक से फैला सन्नाटा, गूंज रही चीत्कार

आम आदमी मरता है।

लेन-देन का होता, अजब यहाँ व्यापार

दुल्हेँ बाजार में बिकते है।

माँ की बेबस ममता, बाप होता है लाचार

औलाद घर अलग बसाती है।

कैसा कलयुग आया, बदल गया संसार

जीत पापी की होती है।

अहसास

आसमाँ के सितारों में झिलमिलाता है।
कभी चाँद में तेरा चेहरा नजर आता है।
बंगियाँ में खिलते फूलों सा तू मुस्कराता है।
मेरी सांसों में तेरी खुशबू महका करती है।
अपने नाम को तेरी आवाज में सुनती हूँ।
हवाओं के झोंके सा मुझे छूकर चला जाता है।
तेरे होने का मुझे अहसास करा जाता है।
ढूढती हूँ जग में तुझे नजर नहीं आता है।
मेरे रोम-रोम में इस कदर समां जाता है।
तेरे अहसास से मेरा जीवन महक जाता है।

Wednesday, February 18, 2009

फागुन आया है

प्रियतम को भेज दो संदेश,
सखी ! फागुन आया है।
बौरों से भर गई अमवा की डार,
खेतों में छाई पीली सरसों की बहार।
सखी ! फागुन आया है।
रतनारे केसू के फूलों से वन हरषाए,
बांगो में कोयल ने मीठे गीत सुनाए।
सखी ! फागुन आया है।
लाल-गुलाबी, नीले-पीले रंग उडे है,
मद-मस्त हुए सब होली की धूम मची है।
सखी ! फागुन आया है।
शीतल-मंद- सुगन्धित समीर बहे चहु ओर,
सारा आलम झूम उठा नाचे मन मयूरा चितचोर।
प्रियतम को भेज दो संदेश,
सखी ! फागुन आया है।


Monday, February 16, 2009

नासमझ

छीन कर सपने उनके पकडा दी बन्दूक,
निज जीवन से दूर हुए मासूम नवयुवक।
अच्छी तरह ना अभी होश सम्भाला था,
स्वयं को भी अभी कँहा उन्होंने पहचाना था।
कुछ जालिमों ने पुरा करने अपना मकसद,
बना लिया मोहरा भर दी इनमे नफरत।
तोड़ कर सपने अपने निकल पड़े ये नासमझ,
अपने हाथों जला रहे निज घर कँहा इन्हें समझ।
दिल में उनके भी तो उठती होंगी कसक,
अपनो की याद में रोते होंगे ये भी सिसक-सिसक।

Friday, February 13, 2009

संघर्ष और जीवन

जीवन में बांधाए व मुसीबते नही आए यह असंभव है। अथवा यह कहना ज्यादा उचित होगा कि संघर्ष विहीन जीवन की कल्पना ही नही की जा सकती है। वैसे भी संघर्ष रूपी तूफानों का प्यार जिंदगी में कभी-कभी ही नसीब होता है। और जो इस प्यार को भी खुशी-खुशी अपना लेता हे उसी का जीवन सफल होता है।

आग में तपकर जिस तरह सोना और अधिक निखर उठता है। उसकी चमक पहले से कई गुना अधिक बढ़ जाती है। उसी तरह जीवन में आने वाली बांधाए व मुसीबते जिंदगी में कई नई राहों से हमारी पहचान कराती है। हमारे इरादों को मजबूत बना उन्हें और अधिक दृढ़ करती है। हमारा जीवन अधिक बेहतर बनता है।

जीवन में वही व्यक्ति कामयाब होता हे। जो संघर्षो का आत्म-विश्वास के साथ सामना करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। तूफान के आने पर लहरों का बढ़ा हुआ वेग देख नाविक अपना आत्म-बल खोकर बैठ नही जाता बल्कि बिना डरे उस तूफान से लड़ने की कोशिश करता है। और तब तक नही रुकता जब तक की तूफान से जीत न जाए। तूफान से मुकाबला करते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर ही साँस लेता है। अगर वह डर जाए तब लहरों की थपेडो से किसी भी किनारे पर पहुँच जाता है, जो कि उसकी मंजिल नही होती।

कहने का मतलब यह हे कि जीवन में संघर्षों का आना कोई नई बात नही है।जीवन में जितना संघर्षो से सामना हो हमारा जीवन अधिक निखर उठता है। किन्ही भी परिस्थितियों में बिना घबराए उस पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जो व्यक्ति ऐसा कर जाता है, वह व्यक्ति ही विजयी होता है।

Wednesday, February 11, 2009

दुर्घटना

होता हे प्रवेश दुर्घटना का जिंदगी में,
समुन्द्र में आए विकराल तूफान की तरह।
कश्तियाँ डूबा, साहिलों को तोड़ता तूफान,
आत्म -बल को तोड़,दुर्घटना बिखेर देती परिवार।
जब घटित होती दुर्घटना या आता तूफान,
रह जाता मातम चारो ओर या फिर हाहाकार।
नाम दे सकते हम इसको ईश्वर का कहर,
या फिर मान सकते इसे समय की मार।

Tuesday, February 10, 2009

बेटियाँ

मधुर शब्दों में अपने, मिठास शहद की घोलती।
बाबुल का मन मोहती, अपनी मीठी वाणी से॥
फूलों सी महकाती, स्नेह सुधा-रस फैलाती।
बरसाती प्यार अपार, बाँध लेती प्रेम-बंधन में॥
चिडियाँ सी चहचहाती, माँ के दिल को हर्शाती।
बटोर लेती स्नेह अनमोल, माँ के आँचल से॥
छा जाती हें बहार, खुशियाँ संग ले आती।
जब लेती जन्म बेटियाँ, बाबुल के आँगन में॥

Sunday, February 8, 2009

याद आता हे...

दबे पाँवो चुपके से आकर भर लेना,
अपनी बाहों में, याद आता हे मुझे।
नजर बचा सबकी पल-पल वो निहारना,
उन प्यार भरी निगाहों से, याद आता हे मुझे।
मेरी आँख के आँसू को अनमोल समझाना,
समेट लेना अपनी मुठ्ठी में, याद आता हे मुझे।
जरा-जरा सी बात से मेरा नाराज होकर रूठना,
तेरा मनाना बड़े जतन से, याद आता हे मुझे।
"बिन तेरे में कुछ भी नही " तेरा कहना,
आशिकाना अंदाज में, याद आता हे मुझे।

Saturday, February 7, 2009

इंतजार

मेरी हर श्वास में तेरा नाम,

हर ख्याल में तेरी ही तस्वीर है।

मेरे हर एक पल में तेरी याद,

मेरी कहानियों में तेरे किस्से है।

मेरी हर दुआ में तेरी ख्वाइश,

हर आस में तेरी ही प्यास है।

जब की मुझे भी है मालूम,

कि अब तू मेरे पास नही है।

फिर भी मुझे क्यो, सिर्फ तेरा,

तेरा ही, क्यो इन्तजार है।

Thursday, February 5, 2009

भाई की शुभकामना

एक भाई के द्वारा अपनी बहन के जन्म-दिवस पर भेजी गई शुभकामना उसी के शब्दों में ,

जिस बहना की राखी से,
सज गयी मेरी रिक्त कलाई।
उसके जन्म-दिवस पर करता,
मनोकामना यह भाई -
शत वर्षो तक बहन आपके ,
जीवन में यह दिन आए।
हर्ष आपका अनुचर हो,
समृद्धि संगिनी बन जाए।
सुख -सरिता हर पंथ बहे ,
शुभता हर पल गुंजन गाये ।
हर सुस्वप्न की संरचना ,
ढल जाए सत्याकार में ।
उल्लास संचारित हो सदैव ,
सुस्वास्थ्य बसे परिवार में।

Tuesday, February 3, 2009

सिर्फ़ एक जीरो

भगवान कभी कोई ग़लत नही करते है या फिर उनसे कोई गलती हो ही नही सकती। लेकिन आज लगता हे कि कलयुग में आकर वह भी बदल गए है, उनसे भी गलतिया होने लगी। और शायद भगवान अपनी जगह सही भी हो। "मेरे ही कुछ बुरे कर्मो के फल भोगने बाकी रह गए थे,कि भगवान ने मेरे विनय को मुझसे छीन लिया।" सोचते सोचते अनायास निकल आए आंसुओ को पोछते हुए शिवानी अपने काम में लग गई।
एक समय था जब शिवानी के पास समय ही नही होता था। घर का काम खत्म कर फुरसत पाती कि किसी न किसी सहेली का फोन आ जाता, और कुछ ना कुछ प्रोग्राम पहले से ही बन जाते दिन कब निकल जाते पता ही नहीं चलता। शाम को विनय के आने के बाद तो घर में शोर मचा रहता। "तुम्हारे सास बहु के सीरियल से परेशान हो गया हूँ "।विनय अपना चैनल लगाना चाहते ,पर शिवानी कँहा मानने वाली थी। बेचारा विनय हार मान कर रह जाता। उसका उदास चेहरा देख उसके लिए चैनल लगा देती। "पहले ही कर देती " विनय हंसने लगते। तब तक बच्चे आकर परेशान करना शुरू देते "पापा हम कहानी सुनेगे तब ही सोएगे"। बच्चे पापा को छोड़ते ही नही आख़िर विनय को उठना ही पड़ता।
दरवाजे की घंटी के साथ ही शिवानी आज में लौट आई जो कि बीते कल से बिल्कुल बदल चुका था। बच्चे स्कूल से आ गए , शिवानी बच्चो को खाना देने में लग गई। बच्चे भी विनय के जाने के बाद चुप से हो गए थे। अपनी माँ को खुश करने के लिए कभी कभी उनके चेहरे पर बनावटी हँसी , और उनकी मासूम सी बातें सुनकर शिवानी महसूस करती उससे उसके बच्चे ज्यादा समझदार है। गम की स्याही ने इस कदर उसके मन को रंग दिया कि उसे लगता था कि जैसे सभी रास्ते बंद हो गए है। बिना विनय के वह अपनी जिंदगी कैसे गुजारेगी। उसके गम को समझने वाला कोई नही था , जो था उसे भगवान ने अपने पास बुला लिया था।
शिवानी का समय जैसे रुक सा गया था।किसी में भी उसका मन नही लगता ,और कही मन लगाने की कोशिश करती तो वह व्यर्थ ही जाती। जो सब लोगो के बीच खुश रहा करती थी ,उसे अब उन्ही लोगो के बीच जाने में और बात करने में डर लगने लगा था। घर की चारदीवारी में विनय की यादो के साथ शिवानी ने अपने आप को कैद कर लिया था।
समय अपनी रफ्तार नही छोड़ता है ,हाँ सुख के दिन आसानी से बीत जाते हे तो दुख के दिन भारी होते हुए भी गुजर ही जाते है। एक दिन विनय के ऑफिस से बुलावा आया। कम्पनी के मालिक ने शिवानी से मिलकर अगले दिन से ही ऑफिस आने के लिए बोल दिया। घर में सभी चाहते थे की शिवानी कुछ करने लगे , शिवानी को भी यह ठीक लगा। शायद ऑफिस के काम में व्यस्त होकर उसका समय आसानी से गुजरने लगे ,और शायद उसका खोया आत्मविश्वास उसे फिर से मिल जाए।
अगले दिन कमल भैया उसका नियुक्ति-पत्र लेकर आए जिसमे उसका वेतन आठ हजार रुपये बताया गया था। "धीरे -धीरे आपका वेतन भी बढ़ जाएगा,वैसे भी आप अभी सीख रही है "। भैया उसे समझा रहे थे।शिवानी जानती थी की समझाने की वजह कम वेतन था। "कम वेतन होते हुए भी यह मेरे लिए बहुत अमूल्य है ,कुछ जानकारी नही होते हुए भी काम देना, यह बहुत बड़ी बात है"। शिवानी ने सरलता से जवाब दिया। भैया कुछ देर बैठ कर चले गए।
शिवानी चुपचाप बैठी कुछ सोच रही थी। "मम्मी क्या हुआ ?आप क्या सोच रही है? " बेटी के पूछने पर शिवानी ने जवाब दिया "कुछ नही बेटा बस ऐसे ही बैठी थी ".शिवानी ने बात को बदल दी । शायद उसने भैया और शिवानी की बात सुन ली थी । "मम्मी अच्छा हुआ ना अब आप भी काम के लिए जाया करेगी, और आप हमेशा उस जगह को देख सकेगी जहा पापा बैठ कर काम किया करते थे। मुझे मालुम हे पापा को अस्सी हजार रूपये वेतन था और आपको आठ हजार मिलने वाला है ,लेकिन आप चिंता मत कीजिये क्योकि पापा के वेतन में आपसे सिर्फ एक जीरो ही तो ज्यादा है। और देखते ही देखते एक दिन आपके भी बढ़ जाएगा "। अपनी बेटी की बातें सुनकर शिवानी हतप्रभ रह गई। किस तरह उसने एक जीरो का फर्क बताकर अपनी माँ का मान रख लिया। शिवानी जानती थी की उस एक जीरोतक वह कभी नही पहुच पाएगी , लेकिन उसकी बेटी ने उसे उस एक जीरो के काफी नजदीक पहुचा दिया था।कभी कभी बच्चे भी ऐसी बात कह जाते हे की बड़े सोच ही नही पाते है।
उस दिन शिवानी को अहसास हुआ की विनय उसे कहा अकेला छोड़ कर गया है ,उसके यह अंश उसी के समान उसका सहारा बनकर उसकी हिम्मत को बनाए रखेगे ।
शिवानी एक बार फिर से नई राह पर निकल पड़ी , अपने बच्चो और विनय की यादो के साथ ........... ।

Friday, January 30, 2009

खुशिया

मेरा भरा पूरा परिवार है। रिश्तों के नाम पर मेरे पास कोई कमी नही है। ईश्वर का बनाया हुआ हर रिश्ता मेरे पास है , यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि ईश्वर ने मुझे छप्पर फाड़ कर दिया है । घर पर सभी बडो की लाडली बेटी , भाई बहनों की प्यारी सी दीदी यहाँ तक की रिश्तेदार और पड़ोसी तक मुझे अपनी बेटी की तरह मानते है। ससुराल में भी प्यार की कोई कमी नही।
लाड प्यार में पली बढ़ी शादी के कुछ सालो बाद सिंगापोर चली गई। मै मेरे पति और हमारी बेटी इसके अलावा हमारी किसी से कोई पहचान नही , मेरे पति सुबह से रात तक अपने ऑफिस के काम में व्यस्त रहते , बाहर निकल कर देखो तो चहरे भी पराये से लगते थे। लोग तो लोग देश भी पराया था ऐसे में कोई भारतीय चेहरा दिखाई पड़ता था तो मन खुशी से नाच उठता था।
धीरे -धीरे दिन बीतते गए कुछ भारतीय लोगो से हमारी पहचान होने लगी , और देखते ही देखते वहा पर भी मेरे कई रिश्ते बन गए। कोई बेटी की तरह मुझे प्यार करता था तो कोई बड़ी बहन की तरह मुझे आदर देता था। बहुत से भारतीय बच्चे जो अपने परिवार से दूर यहाँ नौकरी कर रहे थे। मेरे यहाँ आने लगे। मेरे यहाँ आकर उन्हें अपने घर की कमी नही खलती थी, और मै उनमे अपने भाई बहनों की झलक पा जाती थी वहा उन सब लोगो के बीच ऐसे लगता था जैसे अपने ही परिवार के बीच हू। छः साल बाद जब भारत लौटी तब एक बहुत बड़ा परिवार वहा छोड़े जा रही थी।
कुछ ही दिनों में हम अमेरिका आ गए। वहा भी मेरे कई रिश्ते बन गए। इश्वर का आशीर्वाद ही मानूगी ,मुझे कभी भी ऐसा नही लगा की मै अपने परिवार से दूर हू। सब लोगो में मैंने अपनो के प्यार को ढूढ़ ही लिया था
दो साल बाद ही हम भारत आ गए। यहाँ आकर कुछ मुश्किल हुई, आसपास ऐसे लोग थे जो शुरू से परिवार के बीच थे, और शायद रिश्तो की अहमियत नही समझते थे। पहले तो मन किया की फिर से वही चली जाऊ, दूसरा देश है पर लोग तो अपने है , सबको साथ लेकर चलते है ।
लेकिन हे तो इंसान ही यहाँ पर भी मेरा बहुत प्यारा सा परिवार बन गया । और खुशियों में भीगे पल बहुत जल्दी निकलने लगे।
सोसायटी के किसी प्रोग्राम में हम लोग शामिल हुए थे। सभी लोग बहुत खुश दिखाई पड़ रहे थे हँसी का माहौल था । एक आंटी जोकि हमारी सोसायटी में नई आई थी , उदास सी दिखाई दे रही थी। मुझे उनका उदास रहना अच्छा नही लगा। मेरी दादी कहा करती थी " बेटा बडो के पैर छुओ तो आशीर्वाद ही मिलता है "इस सीख को मै आज तक अपनाये हुए हूँ । मैंने जाकर आंटी के पैर छुए और बात करते हुए उदासी की वजह जाननी चाही। वह रो पड़ी बताने लगी "अंकल की तबियत ठीक नही रहतीहै ,फिर भी वह अपने बच्चो के लिए यहाँ उन लोगो के पास आए और अब यहाँ से भी उनकी नौकरी दूसरी जगह हो गयी है ,कोई बात करने वाला नही है "। उन्होंने कहा "बच्चो की कमी उन्हें उदास बनाये रखती है ,खैर तुम्हे देखकर अच्छा लगा"। आंटी ने बात बदलते हुए कहा "आज भी हमारे संस्कार जीवित है ,घर जरुर आना बेटा "। मैंने कहा "जरुर आंटी, अगर आप बुरा नही माने तो एक बात कहना चाहती हूँ। मेरा भी बहुत बड़ा परिवार है भाई- बहन, चाचा -ताऊ सब लोग, वैसे ही ससुराल में भी बहुत बड़ा परिवार ,आज सारे रिश्ते मुझसे कितने दूर है लेकिन कुछ मजबूरिया है जिससे हम सब एक दुसरे से दूर है। लेकिन मै जहा रहती हूँ उन्ही लोगो में अपने सब रिश्ते खोज लेती हूँ "। "उदासी छोडो, और अपने आसपास के लोगो में ही अपनो का प्यार ढूढो । एक दिन खुशिया ख़ुद आपके द्वार पर दस्तक देंगी । आपकी जिंदगी भी अपनों के प्यार की सी खुशबु से महक उठेगी। इतने में तन्वी और विशाल ने आवाज दी " भुआ आओ "
मै चली गई अपने उसी प्यारे से परिवार में जिनके प्यार से मेरी जिंदगी और अधिक खुशनुमा थी। कहते हे कभी -कभी किसी की बात हमारे दिल को छू जाती है , वही हुआ आंटी को मेरी बात बहुत अच्छी लगी शुरुआत शायद मुझे अपनी बेटी बोलकर ही की। उन्होंने मुझे अंकल से भी मिलवाया। आज वह दोनों पति - पत्नी बहुत खुश है अब हम सब लोग उनके परिवार का हिस्सा है।
जरुरी नही हे की हमें सिर्फ़ अपने ही रिश्ते खुशिया दे सकते है, इन रिश्तो के सीमित दायरों से बाहर निकल कर देखिये सारी दुनिया अपना ही परिवार नजर आएगी। आपको तो खुशी मिलेगी ही ,आप भी बहुत से लोगो की खुशी का कारण बनेगे। किसी ने ठीक ही कहा हे की खुशिया खोजने से ही मिलती है।