Monday, February 16, 2009

नासमझ

छीन कर सपने उनके पकडा दी बन्दूक,
निज जीवन से दूर हुए मासूम नवयुवक।
अच्छी तरह ना अभी होश सम्भाला था,
स्वयं को भी अभी कँहा उन्होंने पहचाना था।
कुछ जालिमों ने पुरा करने अपना मकसद,
बना लिया मोहरा भर दी इनमे नफरत।
तोड़ कर सपने अपने निकल पड़े ये नासमझ,
अपने हाथों जला रहे निज घर कँहा इन्हें समझ।
दिल में उनके भी तो उठती होंगी कसक,
अपनो की याद में रोते होंगे ये भी सिसक-सिसक।

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