Thursday, May 14, 2009

साथ

सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ।
सूरज आता नित अपनी स्वर्णिम किरणों के साथ।
चाँद खिलता सदा शीतल चाँदनी की आभा के साथ।
आसमान को भी मिलता झिलमिल सितारों का साथ।
सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ।
फूल महकते हर पल रंग-बिरंगी तितलियों के साथ।
काली-घटाए बरसती जगमगाती बिजलियों के साथ।
प्रकृति भी करती नव-श्रृंगार पाकर मौसम का साथ।
सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ
सवेरा होता मन्दिर की सुमधुर घंटियों की ध्वनी के साथ।
साँझ ढलती लौटती गायों के घुंघरु की आवाज के साथ।
हर पल को भी मिलता नव-सपनों की संरचना का साथ।
सब अपनी जगह बस एक तुम ही नहीं साथ।

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