भगवान कभी कोई ग़लत नही करते है या फिर उनसे कोई गलती हो ही नही सकती। लेकिन आज लगता हे कि कलयुग में आकर वह भी बदल गए है, उनसे भी गलतिया होने लगी। और शायद भगवान अपनी जगह सही भी हो। "मेरे ही कुछ बुरे कर्मो के फल भोगने बाकी रह गए थे,कि भगवान ने मेरे विनय को मुझसे छीन लिया।" सोचते सोचते अनायास निकल आए आंसुओ को पोछते हुए शिवानी अपने काम में लग गई।
एक समय था जब शिवानी के पास समय ही नही होता था। घर का काम खत्म कर फुरसत पाती कि किसी न किसी सहेली का फोन आ जाता, और कुछ ना कुछ प्रोग्राम पहले से ही बन जाते दिन कब निकल जाते पता ही नहीं चलता। शाम को विनय के आने के बाद तो घर में शोर मचा रहता। "तुम्हारे सास बहु के सीरियल से परेशान हो गया हूँ "।विनय अपना चैनल लगाना चाहते ,पर शिवानी कँहा मानने वाली थी। बेचारा विनय हार मान कर रह जाता। उसका उदास चेहरा देख उसके लिए चैनल लगा देती। "पहले ही कर देती " विनय हंसने लगते। तब तक बच्चे आकर परेशान करना शुरू देते "पापा हम कहानी सुनेगे तब ही सोएगे"। बच्चे पापा को छोड़ते ही नही आख़िर विनय को उठना ही पड़ता।
दरवाजे की घंटी के साथ ही शिवानी आज में लौट आई जो कि बीते कल से बिल्कुल बदल चुका था। बच्चे स्कूल से आ गए , शिवानी बच्चो को खाना देने में लग गई। बच्चे भी विनय के जाने के बाद चुप से हो गए थे। अपनी माँ को खुश करने के लिए कभी कभी उनके चेहरे पर बनावटी हँसी , और उनकी मासूम सी बातें सुनकर शिवानी महसूस करती उससे उसके बच्चे ज्यादा समझदार है। गम की स्याही ने इस कदर उसके मन को रंग दिया कि उसे लगता था कि जैसे सभी रास्ते बंद हो गए है। बिना विनय के वह अपनी जिंदगी कैसे गुजारेगी। उसके गम को समझने वाला कोई नही था , जो था उसे भगवान ने अपने पास बुला लिया था।
शिवानी का समय जैसे रुक सा गया था।किसी में भी उसका मन नही लगता ,और कही मन लगाने की कोशिश करती तो वह व्यर्थ ही जाती। जो सब लोगो के बीच खुश रहा करती थी ,उसे अब उन्ही लोगो के बीच जाने में और बात करने में डर लगने लगा था। घर की चारदीवारी में विनय की यादो के साथ शिवानी ने अपने आप को कैद कर लिया था।
समय अपनी रफ्तार नही छोड़ता है ,हाँ सुख के दिन आसानी से बीत जाते हे तो दुख के दिन भारी होते हुए भी गुजर ही जाते है। एक दिन विनय के ऑफिस से बुलावा आया। कम्पनी के मालिक ने शिवानी से मिलकर अगले दिन से ही ऑफिस आने के लिए बोल दिया। घर में सभी चाहते थे की शिवानी कुछ करने लगे , शिवानी को भी यह ठीक लगा। शायद ऑफिस के काम में व्यस्त होकर उसका समय आसानी से गुजरने लगे ,और शायद उसका खोया आत्मविश्वास उसे फिर से मिल जाए।
अगले दिन कमल भैया उसका नियुक्ति-पत्र लेकर आए जिसमे उसका वेतन आठ हजार रुपये बताया गया था। "धीरे -धीरे आपका वेतन भी बढ़ जाएगा,वैसे भी आप अभी सीख रही है "। भैया उसे समझा रहे थे।शिवानी जानती थी की समझाने की वजह कम वेतन था। "कम वेतन होते हुए भी यह मेरे लिए बहुत अमूल्य है ,कुछ जानकारी नही होते हुए भी काम देना, यह बहुत बड़ी बात है"। शिवानी ने सरलता से जवाब दिया। भैया कुछ देर बैठ कर चले गए।
शिवानी चुपचाप बैठी कुछ सोच रही थी। "मम्मी क्या हुआ ?आप क्या सोच रही है? " बेटी के पूछने पर शिवानी ने जवाब दिया "कुछ नही बेटा बस ऐसे ही बैठी थी ".शिवानी ने बात को बदल दी । शायद उसने भैया और शिवानी की बात सुन ली थी । "मम्मी अच्छा हुआ ना अब आप भी काम के लिए जाया करेगी, और आप हमेशा उस जगह को देख सकेगी जहा पापा बैठ कर काम किया करते थे। मुझे मालुम हे पापा को अस्सी हजार रूपये वेतन था और आपको आठ हजार मिलने वाला है ,लेकिन आप चिंता मत कीजिये क्योकि पापा के वेतन में आपसे सिर्फ एक जीरो ही तो ज्यादा है। और देखते ही देखते एक दिन आपके भी बढ़ जाएगा "। अपनी बेटी की बातें सुनकर शिवानी हतप्रभ रह गई। किस तरह उसने एक जीरो का फर्क बताकर अपनी माँ का मान रख लिया। शिवानी जानती थी की उस एक जीरोतक वह कभी नही पहुच पाएगी , लेकिन उसकी बेटी ने उसे उस एक जीरो के काफी नजदीक पहुचा दिया था।कभी कभी बच्चे भी ऐसी बात कह जाते हे की बड़े सोच ही नही पाते है।
उस दिन शिवानी को अहसास हुआ की विनय उसे कहा अकेला छोड़ कर गया है ,उसके यह अंश उसी के समान उसका सहारा बनकर उसकी हिम्मत को बनाए रखेगे ।
शिवानी एक बार फिर से नई राह पर निकल पड़ी , अपने बच्चो और विनय की यादो के साथ ........... ।
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very touching ..... 2 gud :)
ReplyDeleteIt really got my eyes wet for a moment. Keep writing....
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