Monday, July 5, 2010

मेरे अकेलेपन !

आ गले लग जा मेरे अकेलेपन !
दिन पर दिन जायेगे, बीतेगा ऐसे ही जीवन।
आकाश को एक-टक निहारते बीतती सारी रात।
याद आये पल-पल तेरी कही हर एक बात।
ढलते सूरज सा डूबता जाय मेरा ये मन।
जिन्दा लाश की तरह चलता जाए मेरा जीवन।
आ गले लग जा मेरे अकेलेपन !
मेरे हृदय को सुलगाये जुदाई की तपन।
मन की पीर ना दूर हो करू चाहे सौ जतन।
दिन-दिन बढती ही जाए तुझसे मिलने की लगन।
जागते है सारी रात - मै और मेरे यह दो नयन।
आ गले लग जा मेरे अकेलेपन !
दिन पर दिन जायेगे, बीतेगा ऐसे ही जीवन।

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