Thursday, February 26, 2009

अपना घर

एक चिड़िया के बच्चे चार, घर से निकले पंख पसार।

पूरब से पश्चिम को आए , उत्तर से दक्षिण को धाये।

घूम-घाम जब घर को आए, अपनी माँ को वचन सुनाये।

देख लिया हमने जग सारा, सबसे अपना घर है प्यारा।

सुनकर आँख में पानी आया, माँ ने उनको गले लगाया।

सबसे सुंदर सबसे प्यारा, अपना घर है सबसे न्यारा।

Thursday, February 19, 2009

कलयुग

झूठों का बोलबाला, होती है जय-जयकार

सच्चाई दम तोड़ती है।

अनीति का चलता सिक्का, फैला है भ्रष्टाचार

राजनीति पाँव जमाती है।

आतंक से फैला सन्नाटा, गूंज रही चीत्कार

आम आदमी मरता है।

लेन-देन का होता, अजब यहाँ व्यापार

दुल्हेँ बाजार में बिकते है।

माँ की बेबस ममता, बाप होता है लाचार

औलाद घर अलग बसाती है।

कैसा कलयुग आया, बदल गया संसार

जीत पापी की होती है।

अहसास

आसमाँ के सितारों में झिलमिलाता है।
कभी चाँद में तेरा चेहरा नजर आता है।
बंगियाँ में खिलते फूलों सा तू मुस्कराता है।
मेरी सांसों में तेरी खुशबू महका करती है।
अपने नाम को तेरी आवाज में सुनती हूँ।
हवाओं के झोंके सा मुझे छूकर चला जाता है।
तेरे होने का मुझे अहसास करा जाता है।
ढूढती हूँ जग में तुझे नजर नहीं आता है।
मेरे रोम-रोम में इस कदर समां जाता है।
तेरे अहसास से मेरा जीवन महक जाता है।

Wednesday, February 18, 2009

फागुन आया है

प्रियतम को भेज दो संदेश,
सखी ! फागुन आया है।
बौरों से भर गई अमवा की डार,
खेतों में छाई पीली सरसों की बहार।
सखी ! फागुन आया है।
रतनारे केसू के फूलों से वन हरषाए,
बांगो में कोयल ने मीठे गीत सुनाए।
सखी ! फागुन आया है।
लाल-गुलाबी, नीले-पीले रंग उडे है,
मद-मस्त हुए सब होली की धूम मची है।
सखी ! फागुन आया है।
शीतल-मंद- सुगन्धित समीर बहे चहु ओर,
सारा आलम झूम उठा नाचे मन मयूरा चितचोर।
प्रियतम को भेज दो संदेश,
सखी ! फागुन आया है।


Monday, February 16, 2009

नासमझ

छीन कर सपने उनके पकडा दी बन्दूक,
निज जीवन से दूर हुए मासूम नवयुवक।
अच्छी तरह ना अभी होश सम्भाला था,
स्वयं को भी अभी कँहा उन्होंने पहचाना था।
कुछ जालिमों ने पुरा करने अपना मकसद,
बना लिया मोहरा भर दी इनमे नफरत।
तोड़ कर सपने अपने निकल पड़े ये नासमझ,
अपने हाथों जला रहे निज घर कँहा इन्हें समझ।
दिल में उनके भी तो उठती होंगी कसक,
अपनो की याद में रोते होंगे ये भी सिसक-सिसक।

Friday, February 13, 2009

संघर्ष और जीवन

जीवन में बांधाए व मुसीबते नही आए यह असंभव है। अथवा यह कहना ज्यादा उचित होगा कि संघर्ष विहीन जीवन की कल्पना ही नही की जा सकती है। वैसे भी संघर्ष रूपी तूफानों का प्यार जिंदगी में कभी-कभी ही नसीब होता है। और जो इस प्यार को भी खुशी-खुशी अपना लेता हे उसी का जीवन सफल होता है।

आग में तपकर जिस तरह सोना और अधिक निखर उठता है। उसकी चमक पहले से कई गुना अधिक बढ़ जाती है। उसी तरह जीवन में आने वाली बांधाए व मुसीबते जिंदगी में कई नई राहों से हमारी पहचान कराती है। हमारे इरादों को मजबूत बना उन्हें और अधिक दृढ़ करती है। हमारा जीवन अधिक बेहतर बनता है।

जीवन में वही व्यक्ति कामयाब होता हे। जो संघर्षो का आत्म-विश्वास के साथ सामना करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। तूफान के आने पर लहरों का बढ़ा हुआ वेग देख नाविक अपना आत्म-बल खोकर बैठ नही जाता बल्कि बिना डरे उस तूफान से लड़ने की कोशिश करता है। और तब तक नही रुकता जब तक की तूफान से जीत न जाए। तूफान से मुकाबला करते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त कर ही साँस लेता है। अगर वह डर जाए तब लहरों की थपेडो से किसी भी किनारे पर पहुँच जाता है, जो कि उसकी मंजिल नही होती।

कहने का मतलब यह हे कि जीवन में संघर्षों का आना कोई नई बात नही है।जीवन में जितना संघर्षो से सामना हो हमारा जीवन अधिक निखर उठता है। किन्ही भी परिस्थितियों में बिना घबराए उस पर विजय प्राप्त की जा सकती है। जो व्यक्ति ऐसा कर जाता है, वह व्यक्ति ही विजयी होता है।

Wednesday, February 11, 2009

दुर्घटना

होता हे प्रवेश दुर्घटना का जिंदगी में,
समुन्द्र में आए विकराल तूफान की तरह।
कश्तियाँ डूबा, साहिलों को तोड़ता तूफान,
आत्म -बल को तोड़,दुर्घटना बिखेर देती परिवार।
जब घटित होती दुर्घटना या आता तूफान,
रह जाता मातम चारो ओर या फिर हाहाकार।
नाम दे सकते हम इसको ईश्वर का कहर,
या फिर मान सकते इसे समय की मार।

Tuesday, February 10, 2009

बेटियाँ

मधुर शब्दों में अपने, मिठास शहद की घोलती।
बाबुल का मन मोहती, अपनी मीठी वाणी से॥
फूलों सी महकाती, स्नेह सुधा-रस फैलाती।
बरसाती प्यार अपार, बाँध लेती प्रेम-बंधन में॥
चिडियाँ सी चहचहाती, माँ के दिल को हर्शाती।
बटोर लेती स्नेह अनमोल, माँ के आँचल से॥
छा जाती हें बहार, खुशियाँ संग ले आती।
जब लेती जन्म बेटियाँ, बाबुल के आँगन में॥

Sunday, February 8, 2009

याद आता हे...

दबे पाँवो चुपके से आकर भर लेना,
अपनी बाहों में, याद आता हे मुझे।
नजर बचा सबकी पल-पल वो निहारना,
उन प्यार भरी निगाहों से, याद आता हे मुझे।
मेरी आँख के आँसू को अनमोल समझाना,
समेट लेना अपनी मुठ्ठी में, याद आता हे मुझे।
जरा-जरा सी बात से मेरा नाराज होकर रूठना,
तेरा मनाना बड़े जतन से, याद आता हे मुझे।
"बिन तेरे में कुछ भी नही " तेरा कहना,
आशिकाना अंदाज में, याद आता हे मुझे।

Saturday, February 7, 2009

इंतजार

मेरी हर श्वास में तेरा नाम,

हर ख्याल में तेरी ही तस्वीर है।

मेरे हर एक पल में तेरी याद,

मेरी कहानियों में तेरे किस्से है।

मेरी हर दुआ में तेरी ख्वाइश,

हर आस में तेरी ही प्यास है।

जब की मुझे भी है मालूम,

कि अब तू मेरे पास नही है।

फिर भी मुझे क्यो, सिर्फ तेरा,

तेरा ही, क्यो इन्तजार है।

Thursday, February 5, 2009

भाई की शुभकामना

एक भाई के द्वारा अपनी बहन के जन्म-दिवस पर भेजी गई शुभकामना उसी के शब्दों में ,

जिस बहना की राखी से,
सज गयी मेरी रिक्त कलाई।
उसके जन्म-दिवस पर करता,
मनोकामना यह भाई -
शत वर्षो तक बहन आपके ,
जीवन में यह दिन आए।
हर्ष आपका अनुचर हो,
समृद्धि संगिनी बन जाए।
सुख -सरिता हर पंथ बहे ,
शुभता हर पल गुंजन गाये ।
हर सुस्वप्न की संरचना ,
ढल जाए सत्याकार में ।
उल्लास संचारित हो सदैव ,
सुस्वास्थ्य बसे परिवार में।

Tuesday, February 3, 2009

सिर्फ़ एक जीरो

भगवान कभी कोई ग़लत नही करते है या फिर उनसे कोई गलती हो ही नही सकती। लेकिन आज लगता हे कि कलयुग में आकर वह भी बदल गए है, उनसे भी गलतिया होने लगी। और शायद भगवान अपनी जगह सही भी हो। "मेरे ही कुछ बुरे कर्मो के फल भोगने बाकी रह गए थे,कि भगवान ने मेरे विनय को मुझसे छीन लिया।" सोचते सोचते अनायास निकल आए आंसुओ को पोछते हुए शिवानी अपने काम में लग गई।
एक समय था जब शिवानी के पास समय ही नही होता था। घर का काम खत्म कर फुरसत पाती कि किसी न किसी सहेली का फोन आ जाता, और कुछ ना कुछ प्रोग्राम पहले से ही बन जाते दिन कब निकल जाते पता ही नहीं चलता। शाम को विनय के आने के बाद तो घर में शोर मचा रहता। "तुम्हारे सास बहु के सीरियल से परेशान हो गया हूँ "।विनय अपना चैनल लगाना चाहते ,पर शिवानी कँहा मानने वाली थी। बेचारा विनय हार मान कर रह जाता। उसका उदास चेहरा देख उसके लिए चैनल लगा देती। "पहले ही कर देती " विनय हंसने लगते। तब तक बच्चे आकर परेशान करना शुरू देते "पापा हम कहानी सुनेगे तब ही सोएगे"। बच्चे पापा को छोड़ते ही नही आख़िर विनय को उठना ही पड़ता।
दरवाजे की घंटी के साथ ही शिवानी आज में लौट आई जो कि बीते कल से बिल्कुल बदल चुका था। बच्चे स्कूल से आ गए , शिवानी बच्चो को खाना देने में लग गई। बच्चे भी विनय के जाने के बाद चुप से हो गए थे। अपनी माँ को खुश करने के लिए कभी कभी उनके चेहरे पर बनावटी हँसी , और उनकी मासूम सी बातें सुनकर शिवानी महसूस करती उससे उसके बच्चे ज्यादा समझदार है। गम की स्याही ने इस कदर उसके मन को रंग दिया कि उसे लगता था कि जैसे सभी रास्ते बंद हो गए है। बिना विनय के वह अपनी जिंदगी कैसे गुजारेगी। उसके गम को समझने वाला कोई नही था , जो था उसे भगवान ने अपने पास बुला लिया था।
शिवानी का समय जैसे रुक सा गया था।किसी में भी उसका मन नही लगता ,और कही मन लगाने की कोशिश करती तो वह व्यर्थ ही जाती। जो सब लोगो के बीच खुश रहा करती थी ,उसे अब उन्ही लोगो के बीच जाने में और बात करने में डर लगने लगा था। घर की चारदीवारी में विनय की यादो के साथ शिवानी ने अपने आप को कैद कर लिया था।
समय अपनी रफ्तार नही छोड़ता है ,हाँ सुख के दिन आसानी से बीत जाते हे तो दुख के दिन भारी होते हुए भी गुजर ही जाते है। एक दिन विनय के ऑफिस से बुलावा आया। कम्पनी के मालिक ने शिवानी से मिलकर अगले दिन से ही ऑफिस आने के लिए बोल दिया। घर में सभी चाहते थे की शिवानी कुछ करने लगे , शिवानी को भी यह ठीक लगा। शायद ऑफिस के काम में व्यस्त होकर उसका समय आसानी से गुजरने लगे ,और शायद उसका खोया आत्मविश्वास उसे फिर से मिल जाए।
अगले दिन कमल भैया उसका नियुक्ति-पत्र लेकर आए जिसमे उसका वेतन आठ हजार रुपये बताया गया था। "धीरे -धीरे आपका वेतन भी बढ़ जाएगा,वैसे भी आप अभी सीख रही है "। भैया उसे समझा रहे थे।शिवानी जानती थी की समझाने की वजह कम वेतन था। "कम वेतन होते हुए भी यह मेरे लिए बहुत अमूल्य है ,कुछ जानकारी नही होते हुए भी काम देना, यह बहुत बड़ी बात है"। शिवानी ने सरलता से जवाब दिया। भैया कुछ देर बैठ कर चले गए।
शिवानी चुपचाप बैठी कुछ सोच रही थी। "मम्मी क्या हुआ ?आप क्या सोच रही है? " बेटी के पूछने पर शिवानी ने जवाब दिया "कुछ नही बेटा बस ऐसे ही बैठी थी ".शिवानी ने बात को बदल दी । शायद उसने भैया और शिवानी की बात सुन ली थी । "मम्मी अच्छा हुआ ना अब आप भी काम के लिए जाया करेगी, और आप हमेशा उस जगह को देख सकेगी जहा पापा बैठ कर काम किया करते थे। मुझे मालुम हे पापा को अस्सी हजार रूपये वेतन था और आपको आठ हजार मिलने वाला है ,लेकिन आप चिंता मत कीजिये क्योकि पापा के वेतन में आपसे सिर्फ एक जीरो ही तो ज्यादा है। और देखते ही देखते एक दिन आपके भी बढ़ जाएगा "। अपनी बेटी की बातें सुनकर शिवानी हतप्रभ रह गई। किस तरह उसने एक जीरो का फर्क बताकर अपनी माँ का मान रख लिया। शिवानी जानती थी की उस एक जीरोतक वह कभी नही पहुच पाएगी , लेकिन उसकी बेटी ने उसे उस एक जीरो के काफी नजदीक पहुचा दिया था।कभी कभी बच्चे भी ऐसी बात कह जाते हे की बड़े सोच ही नही पाते है।
उस दिन शिवानी को अहसास हुआ की विनय उसे कहा अकेला छोड़ कर गया है ,उसके यह अंश उसी के समान उसका सहारा बनकर उसकी हिम्मत को बनाए रखेगे ।
शिवानी एक बार फिर से नई राह पर निकल पड़ी , अपने बच्चो और विनय की यादो के साथ ........... ।