Thursday, October 14, 2010

अतीत

लोग कहते है अतीत को ढ़ोती हू मै,
जानते नहीं साथ अतीत तो जिन्दा हू मै।
भला छोड़ दू कैसे उसको मै ढ़ोना
जीवन सुना लगे मेरा उसके बिना
उसकी ही गोद में अतिशय सुख पाया
उपहार में मिले वियोग को भी अपनाया
लोग कहते है अतीत को ढ़ोती हू मै,
जानते नहीं साथ अतीत तो जिन्दा हू मै।

कभी तोड़ कर रख देता मुझे अतीत मेरा
आज मेरी हिम्मत भी तो वही बना
अतीत की नींव पर मेरा वर्तमान खड़ा
किस्सा कैसे ख़त्म करू इससे हर-पल जुड़ा
लोग कहते है अतीत को ढ़ोती हू मै,
जानते नहीं साथ अतीत तो जिन्दा हू मै।
जीवन में ख़ुशी छलकाता मधुर यादों से
कभी आंसू छलक आते किसी की याद में
यह सिलसिला तो बंधा मेरी सांसों की डोर से
ना भूल पाऊ बचा अब यही खजाना हाथ में

3 comments:

  1. .....रामा जी, बहुत सुन्दर और कोमल भावनाओं को बहुत ही खूबसूरत शब्दों में प्रस्तुत किया है आपने । बेहतरीन रचना। नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें स्वीकारें।

    ReplyDelete
  2. सुंदर काव्य रचना...सुंदर प्रस्तुति!

    ReplyDelete