Wednesday, April 8, 2009
दरमियाँ
जिधर देखती हू मुश्किलें ही मुश्किलें है।
अपने संग होकर भी अब बेगाने लगते है।
जिंदगी के सब रास्ते बिन तेरे मायूस है।
मर सी गई जैसे जीवन की हर तमन्ना है।
दुनिया की इस भीड़ में भी हम तन्हां है।
हाल क्या होंगा तेरा फिक्र मुझे सताती है।
खोकर तेरे खयालों में तन्हा राते कट जाती है।
Wednesday, April 1, 2009
संस्कार
संस्कार शब्द का सीधा और सरल अर्थ होता है शुद्धिकरण, अर्थात मन, वाणी और शरीर का सुधार होना। हमारे सभी अच्छे या बुरे कर्मो के प्रेरक हमारे संस्कार होते है।
हमारे बच्चों में भी वही संस्कार हो जो हमें हमारे बडों से मिले है, प्रत्येक माता-पिता की प्रबल इच्छा होती है। और साथ ही साथ बच्चों को संस्कारवान बनाने की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी माता-पिता की ही होती है।
पहले हम सभी सयुक्त परिवार में रहा करते थे। उस समय माता-पिता के द्वारा अपने बच्चों को संस्कार देने में कमी होने पर, उस कमी को हमारे बुजुर्ग पूरा कर दिया करते थे। और वह अपनी छोटी-छोटी पर सारगर्भित बातों से बच्चों को संस्कार का पाठ पढाया करते थे। दादी- नानी की कहानियों से बच्चों को बहुत कुछ सीखने को मिलता था।
भारतीय त्योहारों के बारे में सोचे तो यह त्यौहार भी बच्चों को संस्कार का पाठ पढ़ाने में सहायक होते थे। तथा साथ ही साथ उन्हें रिश्तों के लिए जिम्मेदार भी बनाते थे। आज कम से कम हमें अपने बच्चो को अपने सभी त्योहारों से अवगत कराना चाहिए। जिससे वह हमारे संस्कार और संस्कृति को जान सके।
विद्यालय शिक्षा का वह मन्दिर होता है , जहा बच्चा नैतिकता और शिष्टता का पाठ पढता है लेकिन उसका प्रथम विद्यालय उसका घर और सबसे पहली गुरु उसकी माँ होती है। माँ जो शिक्षा और संस्कार अपने बच्चों को दे सकती है वह शिक्षा उसे किसी भी स्थान पर प्राप्त नहीं हो सकती।
आज के युग में हमारे पास समय का अभाव है फिर भी हमें अपनी इस भाग-दौड़ की जिंदगी से थोड़ा सा समय निकाल कर कुछ प्रयास जरुर करना चाहिए। डर लगता है की आधुनिकता की इस अन्धी दौड़ में हमारे संस्कार और संस्कृति सिर्फ सुनहरी यादे बन कर न रह जाए।