ऐ दोस्त !!!
क्यों ये दिल तुझे इतना चाहता है,
जबकि हर बार इसे तू ही तोड़ जाता हैं।
हर बार होता है सवेरा एक नयी आस से ,
और दिन ढल जाता है तेरे साथ की उम्मीद में।
जानती हु हर मोड़ पर विश्वास कुचला जाता है,
फिर क्यों हर बार विश्वास करने को जी चाहता है।
दिल से लगाए बैठी हू दोस्ती को तेरी हे वो अनमोल,
होते देखती हू उसी दोस्ती को सरे-आम ज़ार ज़ार,
शक की बेड़ियों में बाँधी जाती वो बेबस बार बार।
कोनसी अग्नि-परीक्षा देकर यह बेदाग होगी ,
पतझड़ के बाद कब आएगी बसंत बहार की,
जब एक बार फिर हमारी दोस्ती ज़न्नत होगी।