तुम हो मेरे आराध्य,मैं तुम्हारी पुजारिन हूँ।
तुम्हे बैठाकर मन मन्दिर में,बन्द कर लूँगी उसके द्वार।
छुपा लूँगी ज़माने से तुमको अपने आँचल में।
जहाँ चिन्ताओं की गर्म हवाएँ न तुमको छू पाएंगी।
और ना ही कोई ग़म तुम्हे दुःखी कर पायेगा।
कुछ पलों के लिए ही सही पर तुम।
खोकर मेरी प्रीत में शीतलता का सुख पाओगे।
पाकर संग तुम्हारा हर पल खिल सा जाता है।
स्नेह मिश्रित साथ बिताए पलों की स्मृतियाँ।
आँचल को मेरे अद्वितिय सुख से भर जाती हैं.
जब तक मैं हूँ ,तुम मेरे हो।
नहीं छीन सकता कोई तुमको तुम मेरी पूंजी हो।
तुम मेरे हो ! तुम मेरे हो ! हा..तुम मेरे हो !!!
तुम्हे बैठाकर मन मन्दिर में,बन्द कर लूँगी उसके द्वार।
छुपा लूँगी ज़माने से तुमको अपने आँचल में।
जहाँ चिन्ताओं की गर्म हवाएँ न तुमको छू पाएंगी।
और ना ही कोई ग़म तुम्हे दुःखी कर पायेगा।
कुछ पलों के लिए ही सही पर तुम।
खोकर मेरी प्रीत में शीतलता का सुख पाओगे।
पाकर संग तुम्हारा हर पल खिल सा जाता है।
स्नेह मिश्रित साथ बिताए पलों की स्मृतियाँ।
आँचल को मेरे अद्वितिय सुख से भर जाती हैं.
जब तक मैं हूँ ,तुम मेरे हो।
नहीं छीन सकता कोई तुमको तुम मेरी पूंजी हो।
तुम मेरे हो ! तुम मेरे हो ! हा..तुम मेरे हो !!!