कई दिनों के बाद वह घर आया है।
अहसास न हो उसको वह पराया है।
लगाते हो आरोप की वह गुनहगार है।
सच कहो इसके लिए कौन नहीं जिम्मेदार है।
गुनाह तो उसके सब दिखाई पड़ते है।
क्यो करता गया क्या कोई समझता है।
फैलाकर अपनी बाहों को छुपा लो दामन मे।
सुबह का भुला साँझ को घर अपने आया है।
अहसास न हो उसको की अब वह पराया है।
Wednesday, April 14, 2010
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