मेरा भरा पूरा परिवार है। रिश्तों के नाम पर मेरे पास कोई कमी नही है। ईश्वर का बनाया हुआ हर रिश्ता मेरे पास है , यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि ईश्वर ने मुझे छप्पर फाड़ कर दिया है । घर पर सभी बडो की लाडली बेटी , भाई बहनों की प्यारी सी दीदी यहाँ तक की रिश्तेदार और पड़ोसी तक मुझे अपनी बेटी की तरह मानते है। ससुराल में भी प्यार की कोई कमी नही।
लाड प्यार में पली बढ़ी शादी के कुछ सालो बाद सिंगापोर चली गई। मै मेरे पति और हमारी बेटी इसके अलावा हमारी किसी से कोई पहचान नही , मेरे पति सुबह से रात तक अपने ऑफिस के काम में व्यस्त रहते , बाहर निकल कर देखो तो चहरे भी पराये से लगते थे। लोग तो लोग देश भी पराया था ऐसे में कोई भारतीय चेहरा दिखाई पड़ता था तो मन खुशी से नाच उठता था।
धीरे -धीरे दिन बीतते गए कुछ भारतीय लोगो से हमारी पहचान होने लगी , और देखते ही देखते वहा पर भी मेरे कई रिश्ते बन गए। कोई बेटी की तरह मुझे प्यार करता था तो कोई बड़ी बहन की तरह मुझे आदर देता था। बहुत से भारतीय बच्चे जो अपने परिवार से दूर यहाँ नौकरी कर रहे थे। मेरे यहाँ आने लगे। मेरे यहाँ आकर उन्हें अपने घर की कमी नही खलती थी, और मै उनमे अपने भाई बहनों की झलक पा जाती थी वहा उन सब लोगो के बीच ऐसे लगता था जैसे अपने ही परिवार के बीच हू। छः साल बाद जब भारत लौटी तब एक बहुत बड़ा परिवार वहा छोड़े जा रही थी।
कुछ ही दिनों में हम अमेरिका आ गए। वहा भी मेरे कई रिश्ते बन गए। इश्वर का आशीर्वाद ही मानूगी ,मुझे कभी भी ऐसा नही लगा की मै अपने परिवार से दूर हू। सब लोगो में मैंने अपनो के प्यार को ढूढ़ ही लिया था
दो साल बाद ही हम भारत आ गए। यहाँ आकर कुछ मुश्किल हुई, आसपास ऐसे लोग थे जो शुरू से परिवार के बीच थे, और शायद रिश्तो की अहमियत नही समझते थे। पहले तो मन किया की फिर से वही चली जाऊ, दूसरा देश है पर लोग तो अपने है , सबको साथ लेकर चलते है ।
लेकिन हे तो इंसान ही यहाँ पर भी मेरा बहुत प्यारा सा परिवार बन गया । और खुशियों में भीगे पल बहुत जल्दी निकलने लगे।
सोसायटी के किसी प्रोग्राम में हम लोग शामिल हुए थे। सभी लोग बहुत खुश दिखाई पड़ रहे थे हँसी का माहौल था । एक आंटी जोकि हमारी सोसायटी में नई आई थी , उदास सी दिखाई दे रही थी। मुझे उनका उदास रहना अच्छा नही लगा। मेरी दादी कहा करती थी " बेटा बडो के पैर छुओ तो आशीर्वाद ही मिलता है "इस सीख को मै आज तक अपनाये हुए हूँ । मैंने जाकर आंटी के पैर छुए और बात करते हुए उदासी की वजह जाननी चाही। वह रो पड़ी बताने लगी "अंकल की तबियत ठीक नही रहतीहै ,फिर भी वह अपने बच्चो के लिए यहाँ उन लोगो के पास आए और अब यहाँ से भी उनकी नौकरी दूसरी जगह हो गयी है ,कोई बात करने वाला नही है "। उन्होंने कहा "बच्चो की कमी उन्हें उदास बनाये रखती है ,खैर तुम्हे देखकर अच्छा लगा"। आंटी ने बात बदलते हुए कहा "आज भी हमारे संस्कार जीवित है ,घर जरुर आना बेटा "। मैंने कहा "जरुर आंटी, अगर आप बुरा नही माने तो एक बात कहना चाहती हूँ। मेरा भी बहुत बड़ा परिवार है भाई- बहन, चाचा -ताऊ सब लोग, वैसे ही ससुराल में भी बहुत बड़ा परिवार ,आज सारे रिश्ते मुझसे कितने दूर है लेकिन कुछ मजबूरिया है जिससे हम सब एक दुसरे से दूर है। लेकिन मै जहा रहती हूँ उन्ही लोगो में अपने सब रिश्ते खोज लेती हूँ "। "उदासी छोडो, और अपने आसपास के लोगो में ही अपनो का प्यार ढूढो । एक दिन खुशिया ख़ुद आपके द्वार पर दस्तक देंगी । आपकी जिंदगी भी अपनों के प्यार की सी खुशबु से महक उठेगी। इतने में तन्वी और विशाल ने आवाज दी " भुआ आओ "
मै चली गई अपने उसी प्यारे से परिवार में जिनके प्यार से मेरी जिंदगी और अधिक खुशनुमा थी। कहते हे कभी -कभी किसी की बात हमारे दिल को छू जाती है , वही हुआ आंटी को मेरी बात बहुत अच्छी लगी शुरुआत शायद मुझे अपनी बेटी बोलकर ही की। उन्होंने मुझे अंकल से भी मिलवाया। आज वह दोनों पति - पत्नी बहुत खुश है अब हम सब लोग उनके परिवार का हिस्सा है।
जरुरी नही हे की हमें सिर्फ़ अपने ही रिश्ते खुशिया दे सकते है, इन रिश्तो के सीमित दायरों से बाहर निकल कर देखिये सारी दुनिया अपना ही परिवार नजर आएगी। आपको तो खुशी मिलेगी ही ,आप भी बहुत से लोगो की खुशी का कारण बनेगे। किसी ने ठीक ही कहा हे की खुशिया खोजने से ही मिलती है।